सोचने दो और थोडा, सोचने दो और ॥ किस तरह से कम करे हम यंत्र सा यह शोर ॥ खा गया यह शब्द कोमल पी गया संगीत , अनसुना सा हो गया है जिंदगी का गीत , अधर सूने होठ गीले दिखते हर ओर , सोचने दो और ॥ सूर्य से कहते ना बनता दो वही तुम धूप , बादलो से भी छिना वह बादलो का रूप , पर कहे किससे कि है अन्याय यह तो घोर, सोचने दो और ॥
250.00 250.00 0% OFF
200.00 200.00 0% OFF
135.00 135.00 0% OFF
219.00 219.00 0% OFF
175.00 180.00 3% OFF
314.00 349.00 10% OFF
220.00 220.00 0% OFF