सोचने दो और थोडा, सोचने दो और ॥ किस तरह से कम करे हम यंत्र सा यह शोर ॥ खा गया यह शब्द कोमल पी गया संगीत , अनसुना सा हो गया है जिंदगी का गीत , अधर सूने होठ गीले दिखते हर ओर , सोचने दो और ॥ सूर्य से कहते ना बनता दो वही तुम धूप , बादलो से भी छिना वह बादलो का रूप , पर कहे किससे कि है अन्याय यह तो घोर, सोचने दो और ॥
294.00 299.00 2% OFF
311.00 311.00 0% OFF
200.00 250.00 20% OFF
344.00 349.00 1% OFF
500.00 500.00 0% OFF
150.00 150.00 0% OFF
265.00 270.00 2% OFF
195.00 200.00 3% OFF